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#Dehli - वकीलों और पुलिस की लडाई में जीत किसी एक की क्यों नहीं हुई?

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"पुलिस वालों की जिंदगी का भी अजब फसाना है, तीर भी चलाना है और परिंदों को भी बचाना है।"
ऐसा ही मंगलवार को दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान एक तख्ती पर लिखा दिखा। इस देश में जब पुलिस ही अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगे तो फिर आम जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा।
एक समय ऐसा था जब कितना ही बडा आदमी हो वो भी पुलिस के नाम से कांपता था आज की इस स्पेशल रिपोर्ट में हम आपको बताएगें की पुलिस की छवि आखिर किसी वीआईपी के लिए क्यों मायने नहीं रखती। और देश की राजनीती में नेताओं ने कैसे अपने-अपने फायदे के लिए पुलिस को सिर्फ पंचिंग बैग बनाकर रख दिया।
 (photo half side me) आज हम आपको इस स्पेशल रिपोर्ट में दिल्ली में एक पार्किंग को लेकर खड़ा हुआ विवाद कैसे विद्रोह में बदल गया। और पुलिस के जवान क्यों कहने लगे कि उनका हाऊ इज द जोश लो है सर, 
आज हम इस विवाद की मुख्य वजह भी बताएगें। और आपको देश में असुरक्षित होती पुलिस और इस पुलिस विद्रोह की पुरी कहानी बताएगें। जब लोगों की सुरक्षा करने वाले ही सुरक्षित नहीं है तो फिर इस देश में कोई कैसे सुरक्षित रह सकते है। 

हजारों की संख्या में पुलिस के जवान मंगलवार सुबह आईटीओ स्थित पुलिस मुख्यालय के सामने प्रर्दशन करने पंहुचे। जवानों में गुस्सा इतना था कि उन्होनें अपनी ड्युटी पर लौटने से इनकार कर दिया। इसके बाद दिल्ली में 6 जगहों पर प्रदर्शन हुआ, इंडिया गेट पर मार्च निकाला गया। बात सोशल मीडिया के जरिये आम आदमी तक पंहुची तो पुलिस वालों के समर्थन मे उनके परिवार और आम आदमी का भी दर्द झलक उठा, और वो भी पुलिस के जवानों को न्याय दिलाने के लिए सडको पर आ गये।


दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को पुलिस मुख्यालय के सामने आंदोलन किया पुलिस वालों में गुस्सा इतना था कि वे अपने कमिश्नर की भी सुनने को तैयार नहीं थे। पुलिस के जवानों ने कमिश्नर अमूल्य पटनायक की अपील मानने के इनकार कर दिया और उनके सामने हुंटिग करते हुए नारे लगाए कि हमारा डीसीपी कैसा हो किरण बेदी जैसा हो।

पुलिस के जवानों के नारों में किरण बेदी का नाम इसलिए आया क्योंकि फरवरी 1988 में एक चोरी के मामले में गिरफ्तार वकील को पुलिस ने तब के हिसाब से हथकडी लगा कोर्ट में पेश किया। इससे नाराज वकिलों ने प्रदर्शन किया। तब डीसीपी नॉर्थ का ऑफिस तीस हजारी परिसर में ही होता था। प्रदर्शन होते देख उस समय की डीसीपी किरण बेदी ने लाठी चार्ज के आदेश दे दिये। और पुलिस ने सारा मामला निपटा लिया हालाकि इस के बाद किरण बेदी को अपने पद से हटना पडा था।

अब हम आपको बताते है कि मंगलवार को पुरे दिन आखिर कब क्या हुआ।
9 बजे पीएचक्यू के बाहर पुलिस के जवान जूटने लगे। 15 मिनट बाद प्रर्दशन कर रहे पुलिस के जवानों से मिलने नईदिल्ली ड्रिस्ट्रिक डीसीपी ईश सिंघल मिलने आये। इसके बाद अधिकारियों के आने की लाइन लग गई। दोपहर 12.30 बजे पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक ने बात की और भरोसा दिलाया कि वे संयम से काम ले।



पुलिस की मांगे थी कि 

.तीस हजारी कोर्ट में पुलिस के साथ मारपीट करने वाले वकीलों के खिलाफ कानूनी कारवाई की जाए।
.दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील की जाए, जिसमें वकीलों के खिलाफ एक्शन नहीं लिए जाने की बात का जिक्र है।
.सस्पेंड और ट्रांसफर किए गए पुलिस अधिकारियों को वापस काम पर लाया जाया।
.घायल पुलिसकर्मियों को मुआवजा देने के साथ उनके इलाज का पूरा इंतजाम हो।
.पुलिस वेलफेयर यूनियन बनाई जाए, जो भविष्य में किसी भी तरह की आने पर पुलिसकर्मियों के हितों का ध्यान रखें।
.मंगलवार को धरना प्रर्दशन करने वाले और अपनी आवाज उठाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई कारवाई ना की जाए।
.जंहा-जंहा पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की घटनांएं हूई, वंहा केस दर्ज कर आरोपी की गिरफ्तारी हो।

11 घंटे तक चले इस प्रर्दशन के बाद पुलिस कमिश्नर ने जवानों की सभी मांगों को मान लिया जिसके बाद जवानों ने रात 8 बजे इस प्रर्दशन को खत्म किया और इंडिया गेट पंहुचकर मार्च निकाला।

ये विवाद शनिवार 2 नंवबर को तीस हजारी कोर्ट में एक वकील की गाड़ी पार्किंग को लेकर शुरू हुआ, पहले गिरफ्तारी, फिर हिंसक झड़प और बाद में सड़क पर खुली लड़ाई तक पहुंच गया। भिड़ंत के बीच दिल्ली पुलिस की ओर से फायरिंग भी की गई। दो वकील घायल हो गए, जिसके बाद वकील ज्यादा भड़क गए और पुलिस जीप और वहां मौजूद कई वाहनों में आग लगा दी गई।
वकीलों का आरोप है कि जब दिल्ली पुलिस की ओर से फायरिंग की गई तो वहां मौजूद एक वकील के सीने में गोली लग गई, इसके बाद शनिवार को तीस हजारी कोर्ट के बाद दिल्ली के साकेत, कड़कड़डूमा कोर्ट में भी वकीलों ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया।
इसके बाद विवाद ने हवा पकड़ और बडा गया। देश में पुलिस की छवि कैसी है इससे आप और हम भली भांति परिचित है। ऐसे में आम आदमी की मेहनत की कमाई पर एसी गाडियों में द्रोडने वाले नेताओं को पुलिस की छवि पर चिंता जतानी चाहिए। कि व्यवस्था मनाने वाले खुद कैसे सिस्टम का शिकार हो गये।

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