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सरदार पटेल या स्वामी विवेकानंद नहीं, वे वकील साहब थे जिन्होनें पीएम मोदी की जिंदगी पर गहरा असर डाला

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हर नेता बनने की कहानी एक जैसी नहीं होती। कभी नेता परिस्थितियों की उपज होते हैं तो कभी कोई उन्हें राजनीति में लाता है। गांधी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले थे। मायावती को राजनीति में लाने का श्रेय कांशीराम को जाता है। लक्ष्मणराव इनामदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक गुरु थे।

लक्ष्मणराव आरएसएस के स्वयंसेवक थे। कानून की पढ़ाई कर चुके इनामदार गुजरात में संघ के प्रांतीय प्रचारक थे, नरेंद्र मोदी को संघ में लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। एक चाय बेचने वाले पिता के बेटे का राजनीतिक झुकाव महज संयोग ही कहा जाएगा, लेकिन इनामदार ही थे जिनके संपर्क में आने से सामाजिक कार्यों में उनकी दिलचस्पी बढ़ी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेतुबंध के नाम पर एक किताब भी लिखी है। इस पुस्तक में उन्होंने लक्ष्मणराव इनामदार का उल्लेख किया है। इनामदार ने उन्हें बीए में एडमिशन लेने की सलाह दी थी। मोदी के जीवन पर किताबें लिखने वाले लोगों का मानना ​​है कि मोदी के जीवन पर अगर किसी एक व्यक्ति का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा तो वह थे लक्ष्मराव इनामदार।


अपनी किताब में मोदी लिखते हैं, इनामदारजी के व्यक्तित्व से मैंने जो सबसे बड़ी बात सीखी वह थी अपने श्रोताओं को हर दिन उदाहरण पेश करने के लिए प्रेरित करने की कला। अपने से जुड़े एक किस्से का जिक्र करते हुए मोदी ने कहते है कि लक्ष्मण राव बांसुरी दिखाते थे और कहते थे, अगर बजाना जानते हो तो बांसुरी है और नहीं तो सिर्फ छड़ी है।

जब मोदी ने 17 साल की उम्र में घर छोड़ा, तो उनके पास जीवन के लिए कोई ठोस योजना नहीं थी। रामकृष्ण मिशन आश्रम राजकोट और कोलकता के बेलूर मठ पहुंचे। यह भी कहा जाता है कि मोदी अल्मोड़ा में विवेकानंद के आश्रम भी गए थे। दो साल बाद जब वे वडनगर लौटे तो घर में ज्यादा देर तक नहीं रहे।

पीएम मोदी के जीवन पर वकील साहब का प्रभाव

मोदी वापस अहमदाबाद चले गए जहां उन्होंने अपने चाचा की चाय की दुकान पर काम किया। यहां वह फिर से लक्ष्मीराव इनामदार से जुड़ गए। अहमदाबाद के हेडगेवोर भवन पहुंचे। तब से वह पारिवारिक जीवन में कभी नहीं लौटे। मोदी ने सख्त अनुशासन, कड़ी मेहनत करने की क्षमता और लोगों से बातचीत करने का हुनर ​​भी इनामदार से ही सीखा। मोदी को भी योग और प्राणायाम की आदत उन्हीं से मिली।

आपातकाल के दौरान जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगा तो मोदी एक सिख के वेश में आए, जबकि इनामदार ने धोती पहनना बंद कर दिया, कुर्ता-पायजामा पहनना शुरू कर दिया।

लक्ष्मणराव इनामदार का जीवन

इनामदार का जन्म 1917 में पुणे से 130 किलोमीटर दक्षिण में खाटव गांव में हुआ था, एक सरकारी राजस्व अधिकारी की दस संतानों में से एक इनामदार ने 1943 में पुणे यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री लेते ही संघ का दामन थाम लिया था, उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया और हैदराबाद में निजाम के शासन के खिलाफ मोर्चे निकाले, वे गुजरात में आरएसएस के प्रचारक के नाते आजीवन अविवाहित और सादे जीवन के नियम का पालन करते रहे। इनामदार से मोदी 1960 के शुरू में लड़कपन में पहली बार मिले थे इनामदार का 1984 में निधन हो गया था।

 


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